अंकित शर्मा हत्याकांड: कड़कड़डूमा कोर्ट ने दोषसिद्धि के कानूनी मानदंड किए स्पष्ट, कहा- 'काल्पनिक संदेह' नहीं बन सकता बचाव का आधार

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Ankit Sharma murder case: Karkardooma Court clarifies

पूर्वी दिल्ली। Ankit Sharma murder case: Karkardooma Court clarifies, आइबी कर्मचारी अंकित शर्मा हत्याकांड में दोषसिद्धि सुनाते हुए कड़कड़डूमा कोर्ट ने अपने 320 पन्नों के फैसले में आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि की कानूनी कसौटी भी स्पष्ट की।

अदालत ने कहा कि ‘संदेह से परे’ का सिद्धांत काल्पनिक, भावनात्मक या अनुमान आधारित शंकाओं के लिए नहीं है। केवल वही संदेह न्यायिक रूप से स्वीकार्य माना जाएगा, जो रिकार्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हो।

न्यायालय का दायित्व सत्य तक पहुंचना है

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण कुमार सिंह की अदालत ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य हर हाल में दोषसिद्धि करना या प्रत्येक मामले में आरोपित को संदेह का लाभ देना नहीं है।

न्यायालय का दायित्व उपलब्ध साक्ष्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन कर सत्य तक पहुंचना है। यदि प्रस्तुत साक्ष्य किसी सामान्य और विवेकशील व्यक्ति के मन में अपराध के संबंध में विश्वास पैदा करते हैं, तो केवल कल्पनाओं पर आधारित आशंकाओं के आधार पर उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता।

फैसले में अदालत ने ‘रीजनेबल डाउट’ और ‘इमैजिनरी डाउट’ के बीच स्पष्ट अंतर भी बताया। अदालत ने कहा कि ऐसा संदेह, जिसका आधार रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्य न होकर केवल संभावनाएं या अटकलें हों, वह दोषसिद्धि में बाधा नहीं बन सकता। यदि हर दूर की संभावना को भी संदेह मान लिया जाए, तो कानून का प्रभावी क्रियान्वयन संभव नहीं रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का भी दिया हवाला

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आपराधिक मामलों में साक्ष्यों का मूल्यांकन व्यावहारिक दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए।

न्यायालय को यह देखना होता है कि अभियोजन की कहानी सामान्य मानवीय व्यवहार और उपलब्ध तथ्यों से मेल खाती है या नहीं। कानून ऐसी पूर्णता की अपेक्षा नहीं करता, जिसमें किसी भी कल्पना या संभावना के लिए कोई स्थान न बचे।

अदालत ने कहा कि न्यायिक विवेक का प्रयोग करते समय तकनीकी आपत्तियों या सैद्धांतिक संभावनाओं के बजाय मुकदमे के वास्तविक तथ्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

यदि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य विश्वसनीय और भरोसेमंद हों, तो केवल अनुमान आधारित दलीलों के आधार पर उन्हें नकारा नहीं जा सकता। इसी कानूनी सिद्धांत को अपनाते हुए अदालत ने अंकित शर्मा हत्याकांड में आरोपितों को दोषी करार दिया।

फैसले के आधार पर दोषसिद्धि के पांच सबसे महत्वपूर्ण आधार

  1. 91 गवाहों की सुसंगत गवाही: अभियोजन ने 91 गवाह पेश किए। अदालत ने पाया कि प्रत्यक्षदर्शियों, पुलिस अधिकारियों, चिकित्सकों, फोरेंसिक विशेषज्ञों और अन्य गवाहों के बयान एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं।
  2. वैज्ञानिक और चिकित्सकीय साक्ष्यों से पुष्टि: एफएसएल रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और घटनास्थल से जुटाए गए फोरेंसिक साक्ष्यों ने अभियोजन के घटनाक्रम की पुष्टि की। अदालत ने इन्हें निष्पक्ष और विश्वसनीय माना।
  3. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की मजबूत कड़ी: वीडियो फुटेज, मोबाइल फोन की काल डिटेल रिकार्ड (सीडीआर), लोकेशन डाटा और अन्य डिजिटल साक्ष्यों ने आरोपितों की भूमिका और घटनाक्रम को पुष्ट किया।
  4. परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला: अदालत ने कहा कि अलग-अलग साक्ष्यों को जोड़ने पर घटनाओं की एक ऐसी अखंड कड़ी बनती है, जो किसी अन्य निष्कर्ष की संभावना नहीं छोड़ती और अभियोजन का मामला संदेह से परे सिद्ध करती है।
  5. बचाव पक्ष की आपत्तियां खारिज: गवाहों की विश्वसनीयता, एफआइआर में देरी, जांच की निष्पक्षता और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर उठाए गए बचाव पक्ष के तर्कों को अदालत ने साक्ष्यों के समग्र मूल्यांकन के बाद स्वीकार नहीं किया और अभियोजन के मामले को अधिक विश्वसनीय माना।